मुझे कैसे पता चलेगा कि मुझे दिमागी समस्या है?HealthPlanet

Posted on Mon 5th Dec 2022 : 09:48

तनाव, घबराहट, मूड ऑफ होना या फिर उदासी, ये सब लक्षण जिंदगी में एक बार नहीं आते। ये हर दिन आते-जाते रहते हैं। एक दिन में कई बार भी आ सकते हैं। इनके आने और जाने की प्रक्रिया चलती रहती है। लेकिन इन वजहों से हमारे काम, हमारा रुटीन, हमारी बॉडी लैंग्वेज, शरीर में ऊर्जा का स्तर अमूमन ज्यादा प्रभावित नहीं होता। जब ऐसे इमोशंस आकर ठहर जाएं और किसी के मन में अपना घर बनाने लगें तो दिक्कत है। जिस वजह से हमारे सामान्य काम भी प्रभावित होने लगें या उदासी का स्तर उस जगह तक पहुंचने लगे कि मन के भीतर से ऐसी आवाज आने लगे कि अब कुछ भी ठीक नहीं हो सकता, किसी से बात करने का मन बिलकुल न हो। उन सभी चीजों से मन पूरी तरह हट जाए जिनमें पहले काफी दिलचस्पी थी।


डिप्रेशन का पूरी तरह इलाज मुमकिन
रातों की नींद उड़ जाए तो समझिए मामला गड़बड़ है। बड़ी बात यह है कि हर तरह के डिप्रेशन का पूरी तरह इलाज मुमकिन है। शुरुआत काउंसलिंग से हो सकती है और ज्यादा दिक्कत होगी तो शुगर और बीपी की तरह इसे दवा और लाइफस्टाइल में बदलाव के साथ मैनेज किया जा सकता है। अगर लक्षणों पर ध्यान दें तो ज्यादातर बीमारियों को गंभीर होने से पहले रोका जा सकता है। डिप्रेशन भी हमारी ऐसी ही मानसिक परेशानी होती है। यह उदासी से किस तरह अलग है? कब डॉक्टर के पास जाएं, किन लक्षणों के आने के बाद इसे टालना खतरनाक हो सकता है, क्या इसकी दवा कभी बंद नहीं होती? ऐसे ही तमाम अहम सवालों के जवाब देश के बेहतरीन एक्सपर्ट्स से बात करके दे रहे हैं लोकेश के.

कैसे होता है डिप्रेशन?
हमारे दिमाग तक संदेश पहुंचाने के लिए कुछ न्यूरोट्रांसमीटर होते हैं। इनमें सबसे अहम है सेरेटोनिन। यह हमारे मूड को भी रेग्युलेट करता है। इतना ही नहीं हमारे पाचन तंत्र के लिए भी यह दिमाग का संदेश पहुंचाता है। ऐसा माना जाता है कि इसकी कमी से डिप्रेशन की स्थिति बन सकती है। सेरेटोनिन की कमी से नींद में भी खलल पड़ता है। अमूमन दवा इसी को बढ़ाने के लिए दी जाती है।

सेरेटोनिन, डोपामाइन का भी है रोल

सेरेटोनिन के अलावा दूसरे न्यूरोट्रांसमीटर भी अहम काम करते है। ऐसा ही एक न्यूरोट्रांसमीटर है डोपामाइन। यह हमारे मिड ब्रेन से निकलता है। इसे हैपी हॉर्मोन भी कहते हैं। जब इस हॉर्मोन की कमी होने लगती है तो हम अमूमन उदास रहने लगते हैं। इसी तरह दूसरे न्यूरोट्रांसमीटर हॉर्मोन हैं जो हमारी भावनाओं को काबू में रखते हैं। जब इनके स्तर में कमी आने लगती है तब डिप्रेशन वाली स्थिति बन सकती है। दिमाग के किस भाग से ये हॉर्मोन निकल रहे हैं और इनमें कितनी कमी आ रही है, इस आधार पर ही डिप्रेशन के मरीज में लक्षण भी उभरते हैं। ये हो सकते हैं कारण:

जेनेटिक यानी परिवार में किसी को पहले हो चुका है। इसलिए ऐसे लोग सचेत रहें।
कोई ऐसी घटना जिसके बाद लगे कि अब कुछ नहीं किया जा सकता।
किसी करीबी के गुजर जाने से होने वाला खालीपन, जो भर न पाए।
जॉब या बिजनेस में नुकासन के बाद ऐसा लगे कि अब मैं शायद इससे उबर नहीं पाऊंगा।


सवाल: उदासी और डिप्रेशन में क्या फर्क है?
हर शख्स दिन में कई बार या हर दूसरे दिन किसी न किसी बात को लेकर कुछ वक्त के लिए उदास हो सकता है। इसका यह कतई मतलब नहीं कि वह डिप्रेशन में है। यह उदासी आती है और फिर कुछ समय बाद चली भी जाती है। अगर यह उदासी हर दिन में लगातार 10-15 घंटों से ज्यादा बनी रहे और यह क्रम कम से कम 14-15 दिनों तक चले। हंसना मुश्किल हो जाए या फिर कोई बनावटी हंसी हंसे तो वह डिप्रेशन का मरीज हो सकता है। उदासी भी डिप्रेशन का एक कारण है।


ये हैं डिप्रेशन की कैटिगरी
सवाल: क्या डिप्रेशन को कैटिगरी में भी बांट सकते हैं और डॉक्टर की जरूरत कब पड़ती है?
लक्षण और इसकी गंभीरता के आधार पर डिप्रेशन को 3 कैटिगरी में बांट सकते हैं:

1. माइल्ड डिप्रेशन: इसे डिप्रेशन की शुरुआत कह सकते हैं। डॉक्टर की जरूरत यहीं से पड़ती है। कई बार हम इस स्थिति को हल्के में ले लेते हैं। इसमें अमूमन दवा शुरू करने की जरूरत नहीं पड़ती।
हर दिन का रुटीन प्रभावित होने लगे।
उदासी हावी होने की कोशिश करे, पर पूरी तरह न हो पाए।
नींद खराब हो, लेकिन कुछ घंटे फिर भी सो पाएं।
भूख का कम या ज्यादा लगने लगे।
अपनी पसंद की चीजों से मन हटने लगे।
सिर दर्द की शिकायत भी शुरू हो जाए।
खुदकुशी का ख्याल मन में आने लगे।
बहुत जल्दी चिढ़न होने लगे।
सेक्स की इच्छा काफी कम हो जाए।
नशे की तरफ झुकाव हो जाए।

क्या करें:

कभी-कभी दवाएं भी दी जाती हैं। मान लें कि किसी शख्स में बाकी लक्षण उसे परेशान नहीं कर रहे, लेकिन नींद में खलल उसे परेशान कर रहा है तो यह मुमकिन है कि उसे नींद बेहतर करने की ही दवा दी जाए।
अपना रुटीन दुरुस्त करने की कोशिश करें। इस स्थिति में खुद की कोशिश से लाइफस्टाइल में बदलाव हो सकता है। इसके बाद मुश्किल हो जाता है।


2. मॉडरेट डिप्रेशन
इसे माइल्ड डिप्रेशन से आगे की स्टेज कह सकते हैं। लेकिन इसमें लक्षण गंभीर होने लगते हैं। ऐसे में डॉक्टर के पास जाना बहुत जरूरी हो जाता है।
हर दिन का काम पूरी तरह डिस्टर्ब हो जाए। वह बात तो करे, लेकिन अपने ऑफिशल काम करने में सक्षम न हो।

नींद की स्थिति ज्यादा बुरी हो सकती है।
भूख बिलकुल न लगे या बहुत ही ज्यादा लगने लगे।
खुद को नुकसान पहुंचाने या खुदकुशी की इच्छा होने लगे।
सब कुछ छोड़कर कहीं भाग जाने का मन करने लगे।
जल्दी चिढ़ने लगे या कई बार हिंसक भी होने लगे।
बात करने से ही भागने लगे।
सेक्स की इच्छा न के बराबर हो जाए।
डिप्रेशन की वजह से नशे की शुरुआत हो जाए।

क्या करें:
- किसी सायकायट्रिस्ट से मिलें। अमूमन दवा दी जाती है। कई बार ये दवाएं 3 से 5 महीनों तक ही दी जाती हैं। डॉक्टर जो भी दवा दें, उन्हें लें।
- अगर अपना रुटीन दुरुस्त करने की स्थिति में हों तो जरूर करें। इसमें दवा और काउंसलिंग दोनों की जरूरत हो सकती है।


3. सीवियर डिप्रेशन
नाम से ही पता चल रहा है कि सीरियर डिप्रेशन में मरीज की स्थिति काफी गंभीर हो जाती है।

कुछ भी करना अच्छा नहीं लगे।
अपने हर पसंदीदा काम से खुद को अलग करने लगे।
प्रफेशनल ज़िंदगी लगभग खत्म हो जाए।
एनर्जी लेवल जीरो पर पहुंच जाए।
खाना खाए बिना रहने लगे।
सेक्स की इच्छा खत्म हो जाए।
खुद को नुकसान पहुंचाए या खुदकुशी की कोशिश करने लगे।
नशे की लत लग जाए।
खुद को Hopeless, Helpless और Worthless महसूस करना।


ध्यान दें कि सभी डिप्रेशन की कैटिगरी में, सभी डिप्रेशन के मरीजों में सारे लक्षण मौजूद होना जरूरी नहीं है। हां, इनमें से ज्यादातर लक्षण हो सकते हैं।
क्या करें:

सायकायट्रिस्ट की हर बात मानें।
कभी भी दवा को मिस न करें। एक बार भी मिस न करें। अगर किसी दवा को सुबह लेने के लिए कहा गया है और सुबह लेना भूल गए हैं तो उसे दोपहर, शाम या यहां तक कि रात तक भी याद आए तो ले लें क्योंकि जितनी देर तक दवा नहीं लेंगे, बीमारी के लक्षण उभरने लगेंगे।
अपनी मर्जी से कभी भी दवा बंद न करें। अगर ऐसा लगे कि मरीज पूरी तरह ठीक हो गया है, लेकिन डॉक्टर दवा दे रहा है तो दवा खाएं। ऐसा इसलिए क्योंकि डिप्रेशन कुछ समय बाद फिर लौटकर आ सकता है।
ECT और RTMS जैसी थेरपी भी कुछ लोगों को देनी पड़ जाती है।
डिप्रेशन का असर शरीर के दूसरे अंगों पर
इसमें खानपान डिस्टर्ब हो जाता है। रुटीन पूरी तरह डिस्टर्ब हो जाता है। इसलिए हमारी इम्यूनिटी भी कम हो जाती है।
शरीर में दूसरे विटामिन्स और मिनरल्स भी कम हो जाते हैं।
अगर डिप्रेशन के साथ कोई दूसरी बीमारी भी हो तो उसके बढ़ने की आशंका बढ़ जाती है क्योंकि दवा सही टाइम पर नहीं ले पाते। खानपान का भी ध्यान नहीं रख पाते।
डिप्रेशन के मरीज दवा व काउंसलिंग से नॉर्मल ज़िंदगी में लौट जाते हैं। पर्सनल और प्रफेशनल दोनों काम बढ़िया तरीके ने निपटाते हैं। लेकिन इलाज ठीक से न मिले तो परिवार और समाज पर बोझ बन सकते हैं।

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